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राज्यसभा उपसभापति हरिवंश का विदाई संबोधन, नीतीश कुमार, पीएम मोदी और सहयोगी दलों के प्रति जताया आभार

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राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में भावुक विदाई संबोधन देते हुए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और विभिन्न दलों के नेताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संसद में बिताए गए वर्षों ने उन्हें न केवल राजनीतिक अनुभव दिया, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को करीब से समझने का अवसर भी प्रदान किया।
अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि राज्यसभा में उनका कार्यकाल आगामी 9 अप्रैल तक है। पिछले लगभग 12 वर्षों के इस सफर में उन्होंने करीब साढ़े चार वर्ष एक सांसद के रूप में और शेष समय उपसभापति के तौर पर कार्य किया। उन्होंने इस पूरे कार्यकाल को अपने जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय बताते हुए सभी सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता जताई।
हरिवंश नारायण सिंह ने विशेष रूप से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का आभार जताया, जिन्होंने उन्हें दो बार राज्यसभा भेजने का अवसर दिया। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए गर्व और जिम्मेदारी दोनों का विषय रहा और उन्होंने अपनी भूमिका को पूरी निष्ठा से निभाने का प्रयास किया।
उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में उपसभापति के रूप में चुने जाने को भी अपने जीवन की बड़ी उपलब्धि बताया। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति विशेष धन्यवाद और कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी, जिसके लिए वे हमेशा आभारी रहेंगे।
इसके साथ ही उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के अन्य नेताओं का भी आभार व्यक्त किया, जिन्होंने उन्हें इस पद के लिए उम्मीदवार बनाया और समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि यह सामूहिक विश्वास ही था, जिसने उन्हें इस महत्वपूर्ण दायित्व को निभाने का अवसर दिया।
हरिवंश ने अपने संबोधन में सभी राजनीतिक दलों के नेताओं और राज्यसभा के सदस्यों का भी धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि उपसभापति के रूप में कार्य करते समय उन्हें सभी पक्षों से सहयोग मिला, जिससे सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित करने में मदद मिली। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में संवाद और सहमति की भूमिका बेहद अहम होती है और उन्होंने हमेशा इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर काम किया।
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि राज्यसभा जैसे उच्च सदन में कार्य करना एक बड़ी जिम्मेदारी है। यहां विभिन्न विचारधाराओं और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व होता है, ऐसे में संतुलन बनाए रखना और सभी को समान अवसर देना बेहद जरूरी होता है। उन्होंने इस जिम्मेदारी को निभाने में मिले सहयोग के लिए सभी का आभार जताया।
अगर हरिवंश नारायण सिंह के जीवन पर नजर डालें तो उनका सफर काफी प्रेरणादायक रहा है। उनका जन्म 30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ था। शुरुआती शिक्षा गांव में पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा वाराणसी से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने अपने करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की, जहां उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।
पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने कई महत्वपूर्ण संस्थानों के साथ काम किया। एक समय उन्होंने बैंक ऑफ इंडिया में भी सेवा दी, लेकिन बाद में फिर से पत्रकारिता में लौट आए। ‘रविवार’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़ने के बाद उन्होंने अपनी लेखनी के जरिए समाज और राजनीति के मुद्दों को सामने रखा।
1990 के दशक में उनका जुड़ाव हिंदी दैनिक ‘प्रभात खबर’ से हुआ, जहां उन्होंने लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कई नए मानदंड स्थापित किए और अपनी निष्पक्षता और गहराई के लिए पहचाने गए।
पत्रकारिता के दौरान ही उनकी नजदीकियां राजनीतिक नेताओं, खासकर नीतीश कुमार से बढ़ीं। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और जनता दल (यूनाइटेड) से जुड़ गए।
साल 2014 में उन्हें पहली बार राज्यसभा का सदस्य बनने का अवसर मिला। इसके बाद 9 अगस्त 2018 को उन्हें राज्यसभा का उपसभापति चुना गया, जो उनके राजनीतिक करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। बाद में 14 सितंबर 2020 को उन्हें दोबारा इस पद के लिए चुना गया, जो उनके प्रति विश्वास का प्रतीक माना गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरिवंश नारायण सिंह का कार्यकाल संतुलित और संयमित रहा है। उन्होंने सदन की कार्यवाही को मर्यादित तरीके से चलाने की कोशिश की और विवादित परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखा।
हाल के वर्षों में उनकी नजदीकियां भाजपा नेतृत्व के साथ भी बढ़ी हैं। उन्होंने कई महत्वपूर्ण मौकों पर सरकार के पक्ष में सकारात्मक रुख दिखाया, जिसमें नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में उनकी उपस्थिति भी शामिल है।
उनके विदाई संबोधन को केवल एक औपचारिक भाषण के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे उनके पूरे राजनीतिक और संसदीय जीवन के अनुभवों का सार भी माना जा रहा है। उन्होंने अपने संबोधन के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की कि लोकतंत्र में सहयोग, संवाद और सम्मान की भावना सबसे महत्वपूर्ण होती है।
अब जब उनका कार्यकाल समाप्ति की ओर है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे वे किस भूमिका में नजर आते हैं। हालांकि यह तय है कि उनका अनुभव और योगदान भारतीय संसदीय इतिहास में लंबे समय तक याद रखा

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